11 Sep 2010 10:35:11 GMT
आदरणीय अफलातून जी,जय हिन्द! आपका लेख पढा,बहस अच्छा लगा। गोलवलकर तथा हिटलर मेँ काफी समानतायेँ थीँ,प्रथम विश्वयुद्ध मेँ जर्मनी की आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थिति का उपज हिटलर के रुप मेँ प्रकट हुआ। हिटलर के पार्टी का नाम था नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टीं जिसे नाज्शी के नाम से जाना जाता है। अगर जर्मनी के उस परिस्थिति मेँ का. लेनिन जैसा नेतृत्व उन्हेँ मिलता तो जर्मनी का इतिहास ही कुछ और होता। हिटलर को नित्शे से 'सुपर रेश' सिद्धान्त प्राप्त हुआ जिसे गोलवालकर जी कि भी दिशा कह सकते हेँ। हिटलर के साथ गोलवालकर जी कि तुलना करना उचित मैँ नहीँ समझता हूँ क्योँ कि तुलना तो समान हैसियत के लोगोँ से होनी चाहिए, हिटलर ने हजारोँ लोगोँ, यहूदियोँ,कम्युनिस्टोँ का कत्लेआम करवाया था जर्मनी मेँ राष्ट्रवाद के नाम पर परन्तु गोलवालकर जी तथा उनके साथियोँ ने तो देश के बटबारे का विरोध करते करते,काँग्रेस का विरोध करते करते हिन्दू महासभा के डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने प्रथम काँग्रेसी सरकार मेँ उद्योग मँत्री बन गये, हिन्दू महासभा के मुख्यालय 15 आगस्ट,1947 को काला दिवस मनायेँ,वीर साभारकर जी बम्बई स्थित आवास मेँ तिरगाँ झँडा फहराते हुये बटवारे का विरोध किए ,आर.एस.एस. कुछ तय नहीँ कर पाया था यह तो है इनकी कहानी । 6 जून ,47 को गाँधी जी ने पत्रकार फिशर से कहा 'मैँ निश्चित नहीँ फैसिस्टोँ को पराजित कर लोकताँत्रिक देश समूह और सुन्दर एक विश्व का निर्माण करेगेँ। वे ठिक फासिस्टोँ कि तरह ही हो उठ सकते हैँ...ब्रिटिश शासन मेँ फासिस्ट उपादान व्यापक रुप मेँ हैँ और भारतवर्ष मेँ हम लोग प्रतिदिन देख रहे हैँ और अनुभव कर रहे हैँ।' हिटलर ने जितने लोगोँ को मारे हैँ उससे कई गुणा ज्यादा बेकशूर लोगोँ कि कत्लेआम तो अमेरिका और ब्रिटेन ने अब तक के इतिहास मेँ किये हैँ। हिरोशिमा ,नागासाकि,वियेतनाम, क्यूबा,इराक,आफगानिस्तान मेँ जिस बर्बरता का नमूना देखा गया उसे हम क्या कहेँगे?हिटलरशाही या आदमखोरी? साम्राज्यवाद का यह नँगा रुप फासिवाद से कहीँ ज्यादा ताकतबर है, जो फासिवाद को उभरने मेँ मददगार होते हैँ, क्योँ न इन्हीँ के खिलाफ विचार मंथन करेँ।